Saturday, April 20, 2019

हृदय का परिवर्तन



जीवन के छोटे छोटे अनुभव अगर याद रखें तो जीवन के सारे सवालों का जवाब मिल जाये..मगर इंसान की फितरत है भूलना...हर बार हम भूल जाते हैं फिर हर बार जवाब के लिए इधर उधर भागते हैं...कभी मंदिरों में भागते हैं और भगवान् की टोह करने लगते हैं...जीवन इतना बड़ा सवाल नहीं हो सकता जिसका जवाब हम किसी अदृश्य शक्ति में ढूंढे...और कभी भी खुद को ना ढूंढे...इसलिए ना हम खुद से कभी मिल पाते हैं ना उस शक्ति से जो अंदर ही कहीं से निकलती है...वो मंदिर में नहीं होती...वो हमारे अंदर होती है...मंदिर में जाकर तो हम शायद उससे मिलने का प्रयास करते हैं..फिर जैसे ही बाहर निकलते हैं तो फिर से भ्रमित बुद्धि लेकर जीवन जीने लगते हैं...जीवन भी भ्रम..बुद्धि भी भ्रम...

मगर मैं हमेशा कोशिश करती हूँ की खुद को याद रखूं...अपने कर्मो का हिसाब मैं भी तो रखूं..अपने सवालों के जवाब मैं दूसरों से नहीं माँगूंगी....और उस शक्ति से तो कभी भी नहीं जिसने मुझे इतनी शक्ति दी है की जीवन के अनुभवों से खुद को सीखूं और जीऊं....जब मैं 3  साल की थी तब से लेकर आजतक जितने अनुभव याद रख सकती थी उतने रखे और अब उनको लिखती हूँ...क्यूंकि अब वो पहले से ज्यादा धुंधला गए हैं...और शायद धीरे धीरे मिटने भी लगे...किसी को कुछ सिखाने का मकसद नहीं...बस खुद की खोज जारी है...और इस छोटे से किस्से ने मेरे छोटे से हृदय का परिवर्तन किया था इसलिए इसे याद रखना जरुरी है !

हम हर गर्मियों की छुटियों में गाँव जाते थे...हमारे घर में एक बहुत बड़ा नीम का पेड़ था जिसपर हम सारे भाई बहन खेलते थे...मगर गर्मियों में अक्सर वहाँ ततैया (टाँटिए) अपने छत्ते बना लेते थे...जहां देखो सरसों के फूलों से पीले पीले ततैया उड़ते दिखते थे...और हम सब को बहुत बार वो काट भी जाते थे..लेकिन बच फिर वो भी ना पाते थे...फिर किसी दिन सबका खुरापाती दिमाग चला और सबने मिलकर नीम के आस पास सब टांटियों को मारना शुरू कर दिया...फिर हमने सोचा मार मार कर नीम से इनको भगा देंगे फिर नीम पर खेलेंगे...फिर सुबह से शाम तक टांटियों को मारने लगे...मार मार कर उनको इकट्ठा  करने लगे फिर जो सबसे ज्यादा मारता था वो जीत जाता था इसी जिद्द में बहुत टाँटिए मारे...पानी पीते हुए, कभी उड़कर अपने छत्ते को जाते हुए..कभी छत्ते में अपने बच्चोंको सुलाते हुए कब उनपर कहर जाता उनको भी ना पता चलता था...किसी दिन जब छत्ता ही तोड़ देते तो ऐसा लगता की आज पता नहीं कितना महान काम कर दिया और फिर दिल करता की अगली बार और बड़ा छत्ता तोड़ेंगे...

ऐसा करते करते एक दिन मैंने एक बड़ा पत्थर उठाया और नीम के पेड़ के पास गयी...ठीक सर के ऊपर एक बहुत बड़ा छत्ता था...मैंने पत्थर ठीक निशाने पर मारा और वो छत्ता सीधा गिरा मेरे माथे पर,  नाक और आँखों के बीच और जितने टाँटिए उसमे बैठे थे सबने वहीँ काटा...एक पल के लिए समझ नहीं आया की मरेगा कौन टाँटिए या मैं...फिर भागी पापा के पास...और पापा ने तभी बिना देर किये डॉक्टर को बुला लिया...जब तक डॉक्टर आता मैं बेहोश हो गयी थी...इतना ज़हर आंखों के पास सर में फ़ैल गया था की कुछ भी तो हो सकता था...माथा निकल कर बहार गया...डॉक्टर ने कैसे भी कर के ज़हर का असर कम किया होगा फिर जब होश आया तो पापा मेरे पास बैठे थे...

तब मैंने पापा को रोते हुए सब बताया...तो उन्होंने मुझे कहा की किसी भी जीव को मारोगे तो यही तो होगा...इतना दर्द उनको भी होता है...ये पाप जीवन में कभी नहीं करना आज से प्रण करो...तो मैंने बोला की पापा वो तो हमको खाते हैं तब पापा बोले की मारना बंद कर दोगे तो नहीं खाएंगे...मैंने उनकी बात मानी और सोचा देखती हूँ की पापा की बात सही होगी या नहीं...उस दिन के बाद मुझे कभी टाँटिए ने नहीं काटा...ना मैंने कभी उनको मारा...बहुत बार आकर वो मुझ पर बैठे...मैंने उनको भगाया...अब उनको मुझसे और मुझे उनसे डर नहीं लगता...कभी कभी लगता है शायद उनको भी उनके पापा ने कुछ समझाया होगा...जब भी जीवन में अपने घर या बच्चों पर कोई तकलीफ आती है...बहुत से अनुभवों के साथ ये अनुभव भी याद आ जाता है !!